दिन जल्दी-जल्दी ढलता है ! — July 5, 2015

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

हो जाय न पथ में रात कहीं,

मंज़िल भी तो है दूर नहीं-

यह सोच थका दिन का पंथी भी

जल्दी-जल्दी चलता है !

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

 

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगे-

यह ध्यान परों में चिड़ियों के

भरता कितनी चंचलता है !

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

 

मुझसे मिलने को कौन विकल ?

मैं होऊँ किसके हित चंचल ?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को

भरता उर में विह्वलता है !

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।

 

हरिवंश राय बच्चन

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साथी, सब कुछ सहना होगा ! —

साथी, सब कुछ सहना होगा !

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के
प्रतिबंधों में रहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

हम क्या हैं जगती के सर में !
जगती क्या, संसृति सागर में !
एक प्रबल धारा में हमको
लघु तिनके-सा बहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है
उसी तरह से रहना होगा !
साथी, सब कुछ सहना होगा !

हरिवंश राय बच्चन

अधिकार — July 3, 2015

अधिकार

वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना ;

वे नीलम के मेघ, नहीं
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनंत ऋतुराज, नहीं
जिसने देखी जाने की राह ;

वे सूने से नयन, नहीं
जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज़, नहीं
जिनमें बेसुध पीड़ा सोती ;

ऐसा तेरा लोक वेदना,
नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद ;

क्या अमरों का लोक मिलेगा,
तेरी करुणा का उपहार ?
रहने दो हे देव ! अरे
यह मेरा मिटने का अधिकार !

महादेवी वर्मा

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती —

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

हरिवंशराय बच्चन

जाग तुझको दूर जाना — July 1, 2015

जाग तुझको दूर जाना

चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना।

 

अचल हिमगिरि के ह्रदय में आज चाहे कंप हो ले

या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;

आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया

जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!

पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!

जाग तुझको दूर जाना!

 

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?

पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?

विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,

क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल के दल ओस गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!

जाग तुझको दूर जाना!

 

वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,

दे किसे जीवन-सुधा, दो घूँट मदिरा माँग लाया!

सो गई आँधी मलय की, बात का उपधान ले क्या?

विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?

अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?

जाग तुझको दूर जाना!

 

कह न ठंडी सांस में अब भूल वह जलती कहानी,

आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,

राख क्षणिक पतंग की है, अमर दीपक की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मधुर कलियाँ बिछाना!

जाग तुझको दूर जाना!

 

महादेवी वर्मा

जो बीत गई सो बात गई — June 27, 2015

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आँगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई।

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई।

मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु के घट हैं, मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई।

हरिवंश राय बच्चन

नन्हा पौधा —

नन्हा पौधा

एक बीज था गया

बहुत ही गहराई में बोया।

उसी बीज के अंतर में था

नन्हा पौधा सोया।

 

उस पौधे को मंद पवन ने

जाकर पास जगाया।

नन्ही – नन्ही बूंदों ने फिर

उस पर जल बरसाया।

 

सूरज बोला “प्यारे पौधे

निद्रा दूर भगाओ।

अलसाई आँखें खोलो तुम

उठकर बाहर आओ”

 

आँख खोलकर नन्हे पौधे

ने तब ली अंगड़ाई।

एक अनोखी नई शक्ति सी

उसके तन में आई।

 

नींद छोड़ आलस्य त्याग कर

पौधा बाहर आया।

बाहर का संसार बड़ा ही

अद्भुत उसने पाया।

 

 

वेंकटेश चन्द्र पाण्डेय