कविता निधि

मिट्टी का गहरा अंधकार,
डूबा है उसमें एक बीज ;
वह खो न गया, मिट्टी न बना,
कोदों, सरसों से क्षुद्र चीज !

उस छोटे उर में छिपे हुए हैं,
डाल-पात औ’ स्कन्ध-मूल,
गहरी हरीतिमा की संसृति,
बहु रूप- रंग, फल और फूल !

वह है मुट्ठी में बंद किये
वट के पादप का महाकार,
संसार एक ! आश्चर्य एक !
वह एक बूँद, सागर अपार !

बंदी उसमें जीवन अंकुर,
जो तोड़ निखिल जग के बंधन,
पाने को है निज सत्व, मुक्ति !
चिर निद्रा से जग, बन चेतन !

आः! भेद न सका सृजन रहस्य,
कोई भी, वह जो क्षुद्र पोत,
उसमें अनंत का है निवास,
वह जग-जीवन से ओत-प्रोत !

मिट्टी का गहरा अंधकार,
सोया है उसमें एक बीज,
उसका प्रकाश उसके भीतर,
वह अमर पुत्र, वह तुच्छ चीज ?

सुमित्रा नंदन पंत

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