कविता निधि

देव ! तुम्हारे कई उपासक

कई ढंग से आते हैं।

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे

कई रंग की लाते हैं।।

धूमधाम से साजबाज से

मंदिर में वे आते हैं।

मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुऐं

लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं।।

मैं ही हूँ गरीबनी ऐसी

जो कुछ साथ नहीं लाई।

फिर भी साहस कर मंदिर में

पूजा करने चली आई।।

धूप, दीप, नैवैद्य नहीं है

झाँकी का श्रृंगार नहीं।

हाय ! गले में पहनाने को

फूलों का भी हार नहीं।।

मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ?

है स्वर में माधुर्य नहीं।

मन का भाव प्रकट करने को

वाणी में चातुर्य नहीं।।

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा

खाली हाथ चली आई।

पूजा की विधि नहीं जानती

फिर भी नाथ ! चली आई।।

पूजा और पुजापा प्रभुवर

इसी पुजारिन को समझो।

दान-दक्षिणा और निछावर

इसी भिखारिन को समझो।।

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी

ह्रदय दिखाने आई हूँ।

जो कुछ है, बस यही पास है

इसे चढ़ाने…

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