सृष्टि — March 10, 2016

सृष्टि

कविता निधि

मिट्टी का गहरा अंधकार,
डूबा है उसमें एक बीज ;
वह खो न गया, मिट्टी न बना,
कोदों, सरसों से क्षुद्र चीज !

उस छोटे उर में छिपे हुए हैं,
डाल-पात औ’ स्कन्ध-मूल,
गहरी हरीतिमा की संसृति,
बहु रूप- रंग, फल और फूल !

वह है मुट्ठी में बंद किये
वट के पादप का महाकार,
संसार एक ! आश्चर्य एक !
वह एक बूँद, सागर अपार !

बंदी उसमें जीवन अंकुर,
जो तोड़ निखिल जग के बंधन,
पाने को है निज सत्व, मुक्ति !
चिर निद्रा से जग, बन चेतन !

आः! भेद न सका सृजन रहस्य,
कोई भी, वह जो क्षुद्र पोत,
उसमें अनंत का है निवास,
वह जग-जीवन से ओत-प्रोत !

मिट्टी का गहरा अंधकार,
सोया है उसमें एक बीज,
उसका प्रकाश उसके भीतर,
वह अमर पुत्र, वह तुच्छ चीज ?

सुमित्रा नंदन पंत

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ठुकरा दो या प्यार करो — February 20, 2016

ठुकरा दो या प्यार करो

कविता निधि

देव ! तुम्हारे कई उपासक

कई ढंग से आते हैं।

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे

कई रंग की लाते हैं।।

धूमधाम से साजबाज से

मंदिर में वे आते हैं।

मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुऐं

लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं।।

मैं ही हूँ गरीबनी ऐसी

जो कुछ साथ नहीं लाई।

फिर भी साहस कर मंदिर में

पूजा करने चली आई।।

धूप, दीप, नैवैद्य नहीं है

झाँकी का श्रृंगार नहीं।

हाय ! गले में पहनाने को

फूलों का भी हार नहीं।।

मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ?

है स्वर में माधुर्य नहीं।

मन का भाव प्रकट करने को

वाणी में चातुर्य नहीं।।

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा

खाली हाथ चली आई।

पूजा की विधि नहीं जानती

फिर भी नाथ ! चली आई।।

पूजा और पुजापा प्रभुवर

इसी पुजारिन को समझो।

दान-दक्षिणा और निछावर

इसी भिखारिन को समझो।।

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी

ह्रदय दिखाने आई हूँ।

जो कुछ है, बस यही पास है

इसे चढ़ाने…

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Kavita Nidhi — July 13, 2015
सृष्टि — July 11, 2015

सृष्टि

मिट्टी का गहरा अंधकार,
डूबा है उसमें एक बीज ;
वह खो न गया, मिट्टी न बना,
कोदों, सरसों से क्षुद्र चीज !

उस छोटे उर में छिपे हुए हैं,
डाल-पात औ’ स्कन्ध-मूल,
गहरी हरीतिमा की संसृति,
बहु रूप- रंग, फल और फूल !

वह है मुट्ठी में बंद किये
वट के पादप का महाकार,
संसार एक ! आश्चर्य एक !
वह एक बूँद, सागर अपार !

बंदी उसमें जीवन अंकुर,
जो तोड़ निखिल जग के बंधन,
पाने को है निज सत्व, मुक्ति !
चिर निद्रा से जग, बन चेतन !

आः! भेद न सका सृजन रहस्य,
कोई भी, वह जो क्षुद्र पोत,
उसमें अनंत का है निवास,
वह जग-जीवन से ओत-प्रोत !

मिट्टी का गहरा अंधकार,
सोया है उसमें एक बीज,
उसका प्रकाश उसके भीतर,
वह अमर पुत्र, वह तुच्छ चीज ?

सुमित्रा नंदन पंत

ठुकरा दो या प्यार करो — July 10, 2015

ठुकरा दो या प्यार करो

देव ! तुम्हारे कई उपासक

कई ढंग से आते हैं।

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे

कई रंग की लाते हैं।।

 

धूमधाम से साजबाज से

मंदिर में वे आते हैं।

मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुऐं

लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं।।

 

मैं ही हूँ गरीबनी ऐसी

जो कुछ साथ नहीं लाई।

फिर भी साहस कर मंदिर में

पूजा करने चली आई।।

 

धूप, दीप, नैवैद्य नहीं है

झाँकी का श्रृंगार नहीं।

हाय ! गले में पहनाने को

फूलों का भी हार नहीं।।

 

मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ?

है स्वर में माधुर्य नहीं।

मन का भाव प्रकट करने को

वाणी में चातुर्य नहीं।।

 

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा

खाली हाथ चली आई।

पूजा की विधि नहीं जानती

फिर भी नाथ ! चली आई।।

 

पूजा और पुजापा प्रभुवर

इसी पुजारिन को समझो।

दान-दक्षिणा और निछावर

इसी भिखारिन को समझो।।

 

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी

ह्रदय दिखाने आई हूँ।

जो कुछ है, बस यही पास है

इसे चढ़ाने आई हूँ।।

 

चरणों पर अर्पित है, इसको

चाहो तो स्वीकार करो।

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है

ठुकरा दो या प्यार करो।।

 

सुभद्रा कुमारी चौहान

ये अनजान नदी की नावें —

ये अनजान नदी की नावें

ये अनजान नदी की नावें

जादू के-से पाल

उड़ाती

आती

मंथर चाल।

 

नीलम पर किरणों

की साँझी

एक न डोरी

एक न माँझी,

फिर भी लाद निरंतर लाती

सेंदुर और प्रवाल !

 

कुछ समीप की

कुछ सुदूर की,

कुछ चन्दन की

कुछ कपूर की,

कुछ में गेरू, कुछ में रेशम

कुछ में केवल जाल !

 

ये अनजान नदी की नावें

जादू के-से पाल

उड़ाती

आती

मंथर चाल।

 

धर्मवीर भारती

कहते हैं तारे गाते हैं ! — July 5, 2015

कहते हैं तारे गाते हैं !

सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का
यह राग नहीं हम सुन पाते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस कणों में
तारों के नीरव आँसू आते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता
आँसू नीचे झर जाते हैं !
कहते हैं तारे गाते हैं !

हरिवंश राय बच्चन